अंग्रेज़ भारत को कोई “उपहार” या खैरात में आज़ादी देकर नहीं गए थे। यह मुल्क़ किसी एक भाषण, किसी एक चिट्ठी या किसी एक संगठन के रहमो-करम पर आज़ाद नहीं हुआ। भारत की स्वतंत्रता की इमारत लाखों गुमनाम और विख्यात शूरवीरों के खून, हड्डियों और अदम्य साहस की नींव पर खड़ी है। जब ब्रिटिश हुकूमत का ज़ुलुम अपने चरम पर था, तब देश के बेटों और बेटियों ने अपनी गर्दनें कटवाना मंज़ूर किया, लेकिन तिरंगे की आन को झुकने नहीं दिया। लेकिन इतिहास जितना शौर्य का साक्षी रहा है, उतना ही यह विश्वासघात, चुप्पी और अवसरवादिता का भी गवाह है। एक तरफ जहाँ क्रांति के परवाने फाँसी के फंदों को चूम रहे थे, वहीं दूसरी तरफ कुछ शक्तियाँ औपनिवेशिक आकाओं के सामने नतमस्तक होकर अपनी राजनीतिक रोटी सेक रही थीं।
अहिंसा और जन-आंदोलन की ताकत: महात्मा गांधी और कांग्रेस का मार्ग
आज़ादी की लड़ाई में महात्मा गांधी का योगदान एक अभूतपूर्व जनांदोलन का निर्माण करना था। गांधी जी ने भारत के आम किसान, मजदूर और महिलाओं के मन से अंग्रेजों का भय निकाल फेंका।
असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलन: गांधी जी ने दिखाया कि अगर पूरा देश एक साथ काम करना बंद कर दे, तो ब्रिटिश तंत्र पंगु हो सकता है।
सत्याग्रह की शक्ति: नमक सत्याग्रह से लेकर दांडी यात्रा तक, उन्होंने ब्रिटिश औपनिवेशिक कानूनों की धज्जियाँ उड़ाईं।
1942 का ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन: जब द्वितीय विश्व युद्ध के बीच गांधी जी ने “करो या मरो” का नारा दिया, तो पूरा भारत सड़कों पर उतर आया। अंग्रेजों को समझ आ गया कि अब इस देश पर बलपूर्वक शासन करना असंभव है। हालांकि, गांधी जी के अहिंसावादी रास्ते की अपनी सीमाएं थीं, और यही कारण था कि देश के युवा वर्ग ने क्रांति के दूसरे मार्ग को चुना।
इंकलाब की ज्वाला: भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु का बलिदान
जब गांधी जी का अहिंसावादी आंदोलन धीमा पड़ता था या वापस लिया जाता था, तब देश का युवा खून ब्रिटिश हुकूमत की ईंट से ईंट बजाने निकल पड़ता था।
भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु
असेंबली में धमाका: 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने सेंट्रल असेंबली में बम फेंका। उनका मकसद किसी की जान लेना नहीं, बल्कि “बहरी ब्रिटिश सरकार के कानों तक आवाज़ पहुँचाना” था।
वैचारिक क्रांति: भगत सिंह केवल बंदूक उठाने वाले क्रांतिकारी नहीं थे; वे एक प्रखर विचारक थे। उन्होंने बताया कि आज़ादी का मतलब सिर्फ गोरे साहबों की जगह भूरे साहबों का बैठना नहीं, बल्कि हर तरह के शोषण का अंत है।
23 मार्च 1931: लाहौर जेल में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दी गई। 23-24 साल के इन लड़कों ने हंसते-हंसते फंदा चूम लिया और पूरे देश में इंकलाब की ऐसी आग जला दी जिसे अंग्रेज कभी बुझा नहीं सके।
“तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा”:
नेताजी सुभाष चंद्र बोस और आजाद हिंद फौज जहाँ गांधी जी अहिंसा के पुजारी थे, वहीं नेताजी सुभाष चंद्र बोस का स्पष्ट मानना था कि “आज़ादी मांगी नहीं जाती, छीनी जाती है।”
अंतर्राष्ट्रीय गठबंधन: नेताजी ने देश से बाहर जाकर जर्मनी और जापान जैसे देशों से हाथ मिलाया और ब्रिटिश साम्राज्य को सीधे सैन्य चुनौती दी।
आज़ाद हिंद फौज (INA) का गठन: कैप्टन मोहन सिंह और रास बिहारी बोस के प्रयासों को आगे बढ़ाते हुए नेताजी ने INA को पुनर्गठित किया। “दिल्ली चलो” और “जय हिंद” के नारों के साथ आज़ाद हिंद फौज ने पूर्वोत्तर भारत की सीमाओं पर हमला बोला।
ब्रिटिश सत्ता की नींव हिलना: 1945-46 में जब INA के अधिकारियों (सहगल, ढिल्लों, शाहनवाज़) पर लाल किले में मुकदमा चलाया गया, तो भारतीय सेना और नौसेना (1946 की नौसेना बगावत) ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह कर दिया। ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने स्वीकार किया था कि अंग्रेजों के भारत छोड़ने का मुख्य कारण सुभाष चंद्र बोस और भारतीय सेना में फैली बगावत थी।
अनगिनत गुमनाम नायकों का योगदान
आज़ादी केवल चंद बड़े नामों की मोहताज नहीं थी। इसमें देश के हर कोने से उठे लाल-बाल-पाल (लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, विपिन चंद्र पाल), चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक़ उल्लाह ख़ान, रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, और बिरसा मुंडा जैसे महान आदिवासी नायकों का खून शामिल था।
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क्रांतिकारी / नेता |
प्रमुख योगदान / आंदोलन | शहादत / प्रभाव |
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चंद्रशेखर आज़ाद |
HRA/HSRA का पुनर्गठन, काकोरी कांड | अल्फ्रेड पार्क में अंतिम गोली खुद को मारी |
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रामप्रसाद बिस्मिल व अशफ़ाक़ |
काकोरी ट्रेन एक्शन, सांप्रदायिक सौहार्द |
1927 में फांसी |
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बटुकेश्वर दत्त |
असेंबली बम कांड में भगत सिंह के साथी |
काला पानी की सजा |
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अरुणा आसफ अली |
1942 में ग्वालिया टैंक मैदान पर तिरंगा फहराया |
गुप्त आंदोलन का नेतृत्व |
| बिरसा मुंडा |
उलगुलान (आदिवासी विद्रोह) |
ब्रिटिश शोषकों के खिलाफ जल-जंगल-जमीन की जंग |
आज़ादी कैसे मिली: संघर्ष का समेकित परिणाम
भारत को आज़ादी किसी एक घटना से नहीं, बल्कि तीन प्रमुख ताकतों के संयुक्त प्रहार से मिली
जनांदोलनों का दबाव: गांधी जी के नेतृत्व में करोड़ों भारतीयों का निरंतर सडक पर बने रहना।
सशस्त्र क्रांति का खौफ: भगत सिंह, आजाद और नेताजी की सैन्य चुनौती से अंग्रेज बुरी तरह सहम चुके थे।
द्वितीय विश्व युद्ध की मार व नौसेना विद्रोह: द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन आर्थिक और सैन्य रूप से कंगाल हो चुका था। जब 1946 में ‘रॉयल इंडियन नेवी’ के सैनिकों ने बगावत कर दी, तो अंग्रेजों को समझ आ गया कि जिस भारतीय सेना के बल पर वे राज कर रहे थे, अब वह उनके साथ नहीं है। परिणामस्वरूप, 15 अगस्त 1947 को भारत की धरती से ब्रिटिश हुकूमत का सूर्यास्त हुआ।
जब देश में क्रांति की आग जल रही थी, तब RSS क्या कर रहा था?
जब पूरा देश—क्या हिंदू, क्या मुस्लिम, क्या सिख, क्या ईसाई—ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ अपनी जान न्यौछावर कर रहा था, तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और उसके तत्कालीन आकाओं का रुख इतिहास के पन्नों पर बेहद संदिग्ध और आलोचनात्मक रहा है।
ऐतिहासिक दस्तावेज़ों और ब्रिटिश रिकॉर्ड्स का कड़वा सच
1930 का नमक सत्याग्रह: जब गांधी जी दांडी मार्च निकाल रहे थे, तब संघ के संस्थापक के.बी. हेडगेवार ने यह निर्देश दिया था कि संघ एक संगठन के तौर पर सत्याग्रह में हिस्सा नहीं लेगा।
1942 का ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन: जब भगत सिंह की शहादत के बाद देश का युवा सड़कों पर ब्रिटिश गोलियां खा रहा था, तब संघ के दूसरे सरसंघचालक एम.एस. गोलवलकर ने स्वयंसेवकों को ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन से दूर रहने की हिदायत दी थी। गोलवलकर ने अपनी किताब ‘श्री गुरुजी समग्र दर्शन’ (खंड 4) में लिखा था कि “संघ ने 1942 के आंदोलन में प्रत्यक्ष रूप से कुछ न करने का संकल्प लिया था”।
अंग्रेजों को समर्थन और पत्राचार: उस समय के इंटेलिजेंस ब्यूरो की ब्रिटिश रिपोर्टों में स्पष्ट लिखा था कि “संघ ने खुद को कानून के दायरे में रखा है और अगस्त 1942 की गड़बड़ियों में हिस्सा लेने से साफ परहेज किया है”।
मुस्लिम लीग के साथ सरकारें: जब कांग्रेस के नेता 1942 में जेलों में ठूँस दिए गए थे, तब संघ के वैचारिक संरक्षक विनायक दामोदर सावरकर की हिंदू महासभा ने बंगाल, सिंध और उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में ब्रिटिश समर्थक ‘मुस्लिम लीग’ के साथ मिलकर साझा सरकारें चलाईं।
तीखा सवाल: जो संगठन आज देशभक्ति और राष्ट्रवाद का ठेकेदार बनता है, उसने उस समय ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ एक भी बड़ा आंदोलन क्यों नहीं चलाया? जब देश तिरंगे के लिए मर रहा था, तब ये लोग अपने दफ्तरों में लाठियाँ भांज रहे थे और अंग्रेजों से वफादारी की सौगंध खा रहे थे।
आज हम आज़ादी के बाद किस ओर जा रहे हैं?
जिस आज़ादी को भगत सिंह, नेताजी और गांधी ने अपने खून से सींचा था, आज हम उस आज़ादी की 80 सालों की यात्रा के बाद एक बेहद खतरनाक मोड़ पर आकर खड़े हो गए हैं।
क्रांतिकारियों का सपना आज की कड़वी सच्चाई धर्मनिरपेक्ष व समावेशी भारत धर्म और जाति के नाम पर ध्रुवीकरण वैज्ञानिक दृष्टिकोण व शिक्षा अंधविश्वास और नफरती भाषण आर्थिक समानता व जनता का अधिकार पूंजीपतियों का कब्ज़ा व असमानता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता गोदी मीडिया व असहमति पर ‘देशद्रोह’
‘नफरत का बाज़ार’ और भाईचारे का कत्ल
भगत सिंह और अशफ़ाक़ उल्लाह ख़ान ने एक ऐसे भारत का सपना देखा था जहाँ धर्म किसी की देशभक्ति का पैमाना नहीं होगा। लेकिन आज देश को सांप्रदायिकता की भट्टी में झोंका जा रहा है। चुनाव जीतने के लिए पड़ोसियों को आपस में लड़ाया जा रहा है, और नफरत भरे भाषण (Hatred Speeches) को “राष्ट्रवाद” का नाम दिया जा रहा है।
संस्थाओं का पतन और तानाशाही की आहट
लोकतंत्र के चार स्तंभ—न्यायपालिका, विधायिका, कार्यपालिका और मीडिया—जिन्हें जनता के अधिकारों की रक्षा करनी थी, आज सत्ता के आगे नतमस्तक दिखते हैं। गोदी मीडिया पत्रकारिता छोड़ सरकार की चारण-चाटुकारिता में लीन है। असहमति जताने वाले पत्रकारों, छात्रों और बुद्धिजीवियों को ‘देशद्रोही’ या ‘अर्बन नक्सल’ कहकर जेलों में डाला जा रहा है। क्या इसी “आज़ादी” के लिए फांसी के फंदे चुने गए थे?
आर्थिक गुलामी और कॉर्पोरेट का कब्ज़ा
अंग्रेज़ देश को लूटकर ले गए थे, और आज देश के नए ‘साहब’ देश की संपत्तियों को चंद चुनिंदा पूंजीपति मित्रों के हाथों नीलाम कर रहे हैं। जल, जंगल, जमीन, एयरपोर्ट, रेलवे, और पोर्ट्स—सब कुछ बेचा जा रहा है। देश का किसान आज भी सड़कों पर लाठियां खाने को मजबूर है और युवा बेरोज़गारी की मार झेल रहा है।
इतिहास को बदलने का षड्यंत्र
सबसे शर्मनाक बात यह है कि जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में एक बूंद खून नहीं बहाया, आज वे इतिहास की किताबों को बदलकर खुद को “महानायक” और वास्तविक स्वतंत्रता सेनानियों को नीचा दिखाने का घिनौना खेल खेल रहे हैं।
अब जागने का समय है आज़ादी केवल अंग्रेजों के चले जाने का नाम नहीं थी। आज़ादी का मतलब था—भय से मुक्ति, भूख से मुक्ति, और नफरत से मुक्ति। आज अगर भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु या नेताजी जीवित होते, तो वे आज के भारत को देखकर खून के आँसू रोते। वे देखते कि जिस तिरंगे की रक्षा के लिए लाखों ने जानें दीं, आज उसी देश में तिरंगे की आड़ लेकर नफरत और विभाजन की राजनीति की जा रही है। समय आ गया है कि हम सत्ता के झूठे राष्ट्रवाद के नकाब को उतार फेंकें। यदि हमें अपने महान क्रांतिकारियों की शहादत का ज़रा भी सम्मान है, तो हमें आज के इस नए ‘औपनिवेशिक दौर’—जहाँ विचारों पर पाबंदी है और नफरत का राज है—के खिलाफ अपनी आवाज़ उठानी होगी। इंकलाब ज़िंदाबाद!
