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भक्ति, मित्रता और वैराग्य का महासंगम: श्रीमद्भागवत कथा के समापन पर विशाल भंडारे का आयोजन

Published: November 3, 2025

रीवा। रीवा के आदर्श नगर, बरा में परम पूज्य श्री देवेंद्रचार्य जी महाराज के श्रीमुख से प्रवाहित हो रही श्रीमद्भागवत कथा भावों के उत्कर्ष और भक्ति की पराकाष्ठा का साक्षी बना। कथा ने ‘मैत्री भाव’ (मित्रता) और ‘भक्तवत्सलता’ के ऐसे दिव्य आयाम खोले, जिसने श्रोताओं को जीवन के अंतिम सत्य और कृष्ण-नाम की महिमा से परिचित कराया। महाराज श्री ने आज की कथा में जहाँ एक ओर पांडवों के ‘राजसूय यज्ञ’ और ‘यदुवंश के संहार’ जैसे गंभीर प्रसंगों का वर्णन किया, वहीं दूसरी ओर ‘सुदामा चरित’ के अलौकिक प्रेम और ‘गोलोक गमन’ के वैराग्य को भी साकार किया।

अहंकार का पतन: यदुवंश का संहार
कथा के आरंभ में महाराज श्री ने भगवान कृष्ण द्वारा यदुवंशियों को दिए गए उपदेश पर प्रकाश डाला, जिसमें उन्होंने जीवन को दूषित करने वाले चार तत्वों (रूप, यौवन, संपदा और प्रभुता) से दूर रहने की सीख दी। उन्होंने ‘संतों के अपमान’ की घोर निंदा करते हुए राजा निगू (गिरगिट) का प्रसंग सुनाया, जिसने गौदान में हुई एक त्रुटि के कारण गिरगिट योनि प्राप्त की। महाराज श्री ने चेताया कि ब्राह्मण या संत के धन का हनन करने वाले को स्वयं भगवान भी क्षमा नहीं करते। इसके उपरांत, उन्होंने सबसे हृदय विदारक प्रसंग “यदुवंश के संहार” का वर्णन किया। मुनियों द्वारा दिए गए शाप से उत्पन्न हुए ‘मूसल’ के कारण यदुवंशियों के बीच आपस में ही कलह छिड़ गई। भगवान ने अपने कुल को शाप से बचाना उचित नहीं समझा और उन्होंने देखा कि काल (समय) आ चुका है। अपने कुल के विनाश को देखकर भी प्रभु ने शांत भाव रखा और अंततः वह अपने धाम की ओर प्रस्थान करते हैं। महाराज श्री ने समझाया कि काल ही सबसे बड़ा तक्षक (विष) है और एक दिन हर जीवात्मा को शरीर त्यागना ही पड़ता है।

भक्ति और प्रसाद का महाकुंभ: श्रीमद्भागवत कथा के समापन पर विशाल भंडारे का आयोजन
सात दिवसीय श्रीमद्भागवत महापुराण कथा का समापन भक्ति और उत्सव के साथ हुआ। कथा के अंतिम दिवस को प्रभु कृपा के प्रतीक के रूप में एक विशाल भंडारे का आयोजन किया गया। महाराज श्री देवेंद्रचार्य जी के मुखारविंद से कथा श्रवण करने के बाद, क्षेत्र के हजारों भक्तों ने भंडारे में प्रसाद ग्रहण किया। आयोजकों के अनुसार, इस विशाल आयोजन में लगभग 3 हजार से अधिक श्रद्धालुओं ने भक्ति भाव से भोजन पाया। इस दौरान भक्तों ने सहभोज के माध्यम से सामाजिक समरसता का परिचय दिया और भगवान के प्रसाद को ग्रहण कर स्वयं को धन्य महसूस किया। भंडारे में सभी वर्ग के लोगों ने बड़े उत्साह और शांतिपूर्ण तरीके से प्रसाद पाया, जो सफल आयोजन का प्रमाण बना। कथा और भंडारे के सफल आयोजन पर आयोजक समिति ने सभी सहयोगियों और भक्तों का आभार व्यक्त किया।

महाराज श्री ने पांडवों द्वारा आयोजित राजसूय यज्ञ का प्रसंग सुनाया, जहाँ धर्मराज युधिष्ठिर ने सर्वप्रथम पूज्य के रूप में भगवान श्रीकृष्ण को चुना। भगवान की श्रेष्ठता देखकर शिशुपाल ने लगातार कटु वचन कहे। महाराज श्री ने बताया कि जब 100 अपशब्द पूरे हो गए, तब भगवान ने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध किया और एक परम ज्योति निकलकर भगवान के चरणों में समाहित हो गई। यह प्रसंग दर्शाता है कि भगवान शत्रु के वध द्वारा भी उसे मोक्ष प्रदान करते हैं।

सुदामा चरित: मैत्री भाव का अनूठा उदाहरण
सप्तम दिवस की कथा का केंद्रीय भाव था सुदामा चरित, जिसे सुनकर पूरा पंडाल भावुक हो उठा। महाराज श्री ने बताया कि सुदामा कृष्ण के बचपन के मित्र थे, ब्रह्मज्ञानी थे, संतोषी थे, लेकिन घोर दरिद्रता में जीवन व्यतीत कर रहे थे।

उनकी पत्नी सुशीला के बार-बार आग्रह पर सुदामा जी मात्र चार मुट्ठी चावल की पोटली लेकर द्वारकाधीश से मिलने चल पड़े। द्वारका में, द्वारपालों से ‘सुदामा’ शब्द सुनते ही भगवान श्रीकृष्ण राजसी वस्त्रों की परवाह किए बिना नंगे पाँव दौड़ पड़े और सुदामा को गले से लगा लिया।

“देखी सुदामा की दीन दसा, करुना करि कै करुनानिधि रोए। पानी परात को हाथ छुओ नहिं, नैनन के जल सों पग धोए।। “

भगवान ने अपने अश्रुओं से सुदामा के काँटों से भरे चरणों को धोया और उन्हें सिंहासन पर बिठाया। उन्होंने सुदामा से छिपाकर रखी हुई चावल की पोटली ले ली और पहली मुट्ठी चावल खाते ही सुदामा को दो लोक का वैभव प्रदान कर दिया। जब उन्होंने दूसरी मुट्ठी खानी चाही, तो रुक्मिणी मैया ने उनका हाथ पकड़ लिया, यह कहते हुए कि प्रभु अपना सारा निवास (बैकुंठ) ही दान कर देंगे। सुदामा ने बिना माँगे ही अकूत धन प्राप्त किया और जब वापस अपने गाँव पहुँचे, तो अपनी पुरानी झोपड़ी की जगह भव्य महल देखकर चकित रह गए।महाराज श्री ने इस प्रसंग के माध्यम से समझाया कि सच्ची मित्रता केवल देना जानती है, माँगना नहीं, और प्रभु अपने भक्तों को बिना माँगे ही सब कुछ प्रदान कर देते हैं।

  • भागवत धर्म और गोलोक गमन

    कथा के अंतिम चरण में, महाराज श्री ने भागवत धर्म की तीन धाराएँ बताईं

    1. विश्वास: श्रीमद्भागवत पर अटूट विश्वास रखना।
    2. संबंध: कथा और भगवान से गहरा संबंध बनाना।
    3. समर्पण: मन, वचन और कर्म से भगवान को स्वयं को समर्पित करना।

अंत में, जब यदुवंश का संहार हो गया और पृथ्वी पर धर्म की पुनर्स्थापना हुई, तब भगवान कृष्ण ने देह त्यागने का निश्चय किया। द्वारका में, जरा नाम के शिकारी ने अनजाने में उनके चरण में बाण मारा। भगवान ने उसे क्षमा किया और अपने तेज को श्रीमद्भागवत महापुराण में समाहित कर गोलोक धाम को लौट गए। महाराज श्री ने कथा का सार बताते हुए कहा कि भगवान कृष्ण का कभी जन्म नहीं होता, न मृत्यु होती है; उनका केवल ‘अवतरण’ और ‘अंतर्धान’ होता है।

कलियुग की महिमा और समापन
महाराज श्री ने कलियुग की एक सबसे बड़ी विशेषता बताते हुए कथा का विश्राम किया, “कलियुग केवल नाम अधारा, सुमिर सुमिर उतरहि पारा।” उन्होंने कहा कि भागवत सुनने से जो पुण्य मिलता है, वह तो है ही, लेकिन कलियुग में केवल हरि नाम के संकीर्तन से भी जीव का उद्धार हो जाता है। सप्त दिवसीय कथा का समापन भावपूर्ण आरती, व्यास पूजन और पुष्प वर्षा के साथ हुआ। यजमानों ने व्यासपीठ का पूजन किया और भक्तों ने ठाकुर जी के साथ होली खेल कर इस महायज्ञ का आनंद लिया। महाराज श्री ने कामना की कि कथा के श्रवण से सभी भक्तों के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहे।

 

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