रीवा। 19-20 अगस्त की रात हुई तेज बारिश ने रीवा शहर के विकास मॉडल की ऐसी तस्वीर सामने ला दी, जिसे देखकर बड़े-बड़े दावों की चमक फीकी पड़ गई। कहीं सड़कें तालाब बनीं तो कहीं लोगों के घरों में 2 से 4 फीट तक पानी घुस गया। अरुण नगर आनंदपुर, शिल्पी उपवन, समान बांध, वार्ड क्रमांक 25 और वार्ड क्रमांक 2 की विंध्य विहार कॉलोनी सहित कई इलाकों में जलभराव ने जनजीवन अस्त-व्यस्त कर दिया।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर हर साल बारिश से पहले नालियों की सफाई और जल निकासी की तैयारियों के दावे किस काम के हैं? जब पहली बड़ी बारिश में ही नालियां जवाब दे दें और पानी घरों में घुस जाए, तो फिर बैठकों और कागजी तैयारियों का मतलब क्या रह जाता है?
अरुण नगर आनंदपुर में लोगों का आरोप है कि नाली निर्माण की मांग कई बार की गई, लेकिन सुनवाई नहीं हुई। उधर समान बांध क्षेत्र में घरों में 3-4 फीट पानी पहुंचने के बाद लोग सड़क पर उतरने को मजबूर हुए। वार्ड क्रमांक 2 की विंध्य विहार कॉलोनी में भी लोगों ने सुबह से प्रशासन को सूचना देने की बात कही, लेकिन मोटर पंप और राहत व्यवस्था समय पर नहीं पहुंचने के आरोप लगाए गए।
बारिश ने नेताओं की राजनीति भी भिगो दी
सालभर विकास के पोस्टर, भाषण और घोषणाएं दिखाई देती हैं। चुनाव के समय नेता जनता के दरवाजे तक पहुंचते हैं, लेकिन जब वही जनता पानी में डूबी होती है तो उसे राहत के लिए फोन पर फोन करना पड़ता है। यही राजनीतिक दोहरे चरित्र का सबसे बड़ा उदाहरण है।
नेताओं के लिए विकास का मतलब सड़क, डिवाइडर और सौंदर्यीकरण हो सकता है, लेकिन जनता के लिए विकास का पहला मतलब है—बारिश में घर सुरक्षित रहें।
प्रशासन से सीधा सवाल
कंट्रोल रूम, बाढ़ नियंत्रण दल और आपदा प्रबंधन की व्यवस्था होने के बावजूद यदि प्रभावित लोगों को समय पर मदद नहीं मिलती, तो जिम्मेदारी तय कौन करेगा? कर्मचारियों पर कार्रवाई करना आसान है, लेकिन क्या उन अधिकारियों और जिम्मेदार व्यवस्थाओं की भी जवाबदेही तय होगी, जिनकी तैयारी बारिश के पानी में बह गई?
रीवा को अब बयान नहीं, ड्रेनेज प्लान चाहिए। नालियों की सफाई, तालाबों की निकासी, संवेदनशील क्षेत्रों में पंप और स्थायी जल निकासी व्यवस्था पर काम करना होगा।
क्योंकि इस बार बारिश ने सिर्फ रीवा को भिगोया नहीं है—उसने शहर के विकास की पोल खोलकर रख दी है।
