वाराणसी। प्रयागराज माघ मेले में हुए विवाद के बाद ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के तेवर और भी कड़े हो गए हैं। शुक्रवार (30 जनवरी) को वाराणसी में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि अब बात केवल संगम स्नान की नहीं, बल्कि सनातन धर्म के सम्मान और पहचान की है। उन्होंने सीधे शब्दों में कहा, “अब बात स्नान की नहीं, बल्कि असली और नकली हिंदू की पहचान की है।”
विवाद की जड़ और प्रशासन का रुख
प्रयागराज में प्रशासन के साथ हुए गतिरोध के बाद शंकराचार्य ने मेला छोड़ दिया था। चर्चा थी कि लखनऊ के उच्च अधिकारी उनके संपर्क में हैं और उन्हें माघी पूर्णिमा पर पुनः स्नान के लिए मनाने की कोशिश कर रहे हैं। इस पर पलटवार करते हुए शंकराचार्य ने कहा कि प्रशासन उन्हें ‘फूलों की वर्षा’ और ‘विशेष प्रोटोकॉल’ (SOP) जैसे प्रलोभन दे रहा था, जिसे उन्होंने सिरे से खारिज कर दिया।
“माफी के बिना कोई समझौता नहीं”
शंकराचार्य ने साफ किया कि सम्मान प्रलोभनों से नहीं, बल्कि प्रायश्चित से मिलता है। उन्होंने कहा, “प्रशासन ने निर्दोष संन्यासियों और बटुकों पर लाठियां बरसाई हैं। यदि वे वास्तव में सुधार चाहते हैं, तो उन्हें सार्वजनिक रूप से क्षमा याचना करनी चाहिए।”उन्होंने अधिकारियों के प्रस्ताव को ‘लोभ और लालच’ करार देते हुए कहा कि माफी माँगने का एक तरीका होता है, जो प्रशासन ने नहीं अपनाया।
असली बनाम नकली हिंदू का मुद्दा
शंकराचार्य का सबसे तीखा हमला धर्म के नाम पर राजनीति करने वालों पर था। उन्होंने आरोप लगाया कि:
* देश के हिंदुओं के साथ बड़ा छल हो रहा है।
* खुद को साधु, संत और भगवाधारी बताने वाले लोग ही सनातनियों को धोखा दे रहे हैं।
* तथाकथित ‘नकली हिंदुओं’ का पर्दाफाश करना अब अनिवार्य हो गया है।
उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि हर हिंदू के भीतर ‘हनुमान’ बसता है। जिस तरह हनुमान जी ने कालनेमि का वध किया था, उसी तरह अब सनातनी हर उस छद्म रूपी ‘कालनेमि’ से भिड़ेंगे जो हिंदू धर्म के नाम पर अपनों पर ही डंडे बरसा रहे हैं।
गौ-रक्षा अभियान को प्राथमिकता
शंकराचार्य ने अंत में स्पष्ट किया कि वह इस विवाद को खींचकर अपने मूल लक्ष्य— गौ माता की रक्षा— में बाधा नहीं आने देना चाहते। उन्होंने साफ कहा कि अब यह प्रकरण अगले माघ मेले में ही देखा जाएगा, क्योंकि वर्तमान में उनका पूरा ध्यान गौ-रक्षा के राष्ट्रव्यापी अभियान पर केंद्रित है।
