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रीवा में ‘परफॉर्मेंस’ बनाम ‘प्रोटेस्ट’: जनता को मिला हक, तो सिस्टम में क्यों मची खलबली?

Published: May 8, 2026

रीवा: किसी भी प्रशासनिक इकाई में जब ‘अनुशासन’ और ‘जवाबदेही’ की एंट्री होती है, तो अक्सर व्यवस्था के पुराने ढर्रे को झटका लगता है। रीवा जिले में वर्तमान में कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिल रहा है। कलेक्टर नरेंद्र सूर्यवंशी के कमान संभालने के बाद जिले की प्रशासनिक तस्वीर दो हिस्सों में बंट गई है—एक तरफ वह आम जनता है जो फाइलों की कछुआ चाल से परेशान थी, और दूसरी तरफ वे कर्मचारी हैं जो कलेक्टर की ‘सख्ती’ के विरोध में लामबंद हो रहे हैं।

जनता की खुशी: दफ्तरों में लौटा भरोसा
कलेक्टर सूर्यवंशी ने पदभार संभालते ही पेंडिंग पड़े कामों और समयबद्धता (Punctuality) को अपनी प्राथमिकता बनाया। वर्षों से धूल फांक रही फाइलों का निपटारा होने लगा और आम आदमी को अब अपने जायज काम के लिए बाबुओं के चक्कर नहीं काटने पड़ रहे। जनता के बीच यह संदेश गया है कि यदि काम सही है, तो वह समय पर होगा। कलेक्टर की इस ‘वर्क कल्चर’ वाली छवि ने आम नागरिक का सरकारी तंत्र पर भरोसा बहाल किया है।

  • कर्मचारियों की नाराजगी: अनुशासन या उत्पीड़न?
    वहीं दूसरी ओर, कर्मचारियों का आरोप है कि काम का दबाव अब ‘मानसिक प्रताड़ना’ का रूप ले रहा है। कर्मचारियों का तर्क है कि:
    समय की पाबंदी: ऑफिस में बायोमेट्रिक हाजिरी और समय पर पहुँचने की अनिवार्यता से वे कर्मचारी असहज हैं जो अब तक ढीले-ढाले रवैये के आदी थे।
    पेंडिंग काम का बोझ: सालों का बैकलॉग चंद दिनों में खत्म करने के दबाव और रात 9 बजे तक चलने वाली बैठकों को कर्मचारी अपने मानवाधिकारों का उल्लंघन बता रहे हैं।
    सख्त कार्रवाई: वेतन रोकना और निलंबन जैसी कार्रवाइयों ने डर का माहौल पैदा कर दिया है।

एक बड़ा सवाल: विरोध किसका?
यहाँ प्रश्न यह उठता है कि क्या विरोध ‘अनुशासन’ का है या ‘अमर्यादित व्यवहार’ का? यदि विरोध केवल समय पर ऑफिस आने और जनता के पेंडिंग काम निपटाने को लेकर है, तो यह जनता के साथ अन्याय होगा। लेकिन यदि यह विरोध वास्तव में कर्मचारियों के स्वास्थ्य और उनके स्वाभिमान से जुड़ा है, तो प्रशासन को संवाद का रास्ता चुनना होगा।

आर्थिक तंगी: 6 महीने से वेतन का इंतजार
कर्मचारियों ने कहा कि मनरेगा, आवास और अन्य योजनाओं में कार्यरत कई अधिकारियों-कर्मचारियों को पिछले 5-6 महीनों से वेतन नहीं मिला है। आर्थिक संकट के बावजूद उनसे लगातार लक्ष्य आधारित काम लिया जा रहा है। जिससे मानसिक दबाव लगातार बढ़ रहा है। उपयंत्री विजय मिश्रा ने बताया कि उनकी मां गंभीर बीमारी से ग्रसित हैं लेकिन वेतन नहीं मिलने से उपचार नहीं करवा पा रहे हैं।

हम सब सुबह से शाम तक हम सब से शाम तक काटी जा रही है। मजदूरी का भुगतान नहीं हो रहा है तो गांव में मजदूर काम करने को तैयार नहीं है। पहले दबाव बनाकर सीसी जारी करवाया गया, अब कहा जा रहा है कि वसूली होगी। मानसिक दबाव सहने की स्थिति में अब कर्मचारी नहीं हैं, इसलिए अपनी बात संभागायुक्त के सामने रखी है।
नागेन्द्र सिंह, मनरेगा अधिकारी-कर्मचारी संघ अध्यक्ष

शासन की योजनाओं पर काम कलेक्टर से लेकर कोटवार तक सभी को करना होता है। जिला पंचायत के कार्यों की रैंकिंग लगातार खराब हो रही है, इस पर काम में गति लाने के लिए कहा जा रहा है। वेतन और अन्य किसी भी समस्या के लिए कर्मचारियों को पहले कलेक्टर के पास आना चाहिए लेकिन वह संभागायुक्त के पास चले गए। हमारा किसी से दुर्भाव नहीं है, सभी को अपनी भूमिकाओं पर काम करना चाहिए।
नरेंद्र सूर्यवंशी, कलेक्टर रीवा

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