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Madhya Pradesh

Rewa Health Department में ‘अंधेरगर्दी’: मिशन संचालक के आदेश ताक पर, प्रभारी CMHO की नियुक्ति और करोड़ों की खरीदी पर उठे गंभीर सवाल

Published: February 23, 2026

रीवा। मध्य प्रदेश के रीवा जिले में स्वास्थ्य विभाग एक बार फिर भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अनियमितताओं के भंवर में फंसता नजर आ रहा है। शासन के स्पष्ट दिशा-निर्देशों को दरकिनार कर न केवल प्रभारी मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) की नियुक्ति की गई, बल्कि पद संभालते ही करोड़ों रुपये की दवा और उपकरण खरीदी का खेल भी शुरू हो गया है। ताजा मामला राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के कड़े निर्देशों के उल्लंघन और कलेक्टर की शक्तियों के कथित दुरुपयोग से जुड़ा है।

मिशन संचालक का आदेश हवा: 1.38 करोड़ की नोटशीट तैयार
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) मध्य प्रदेश की मिशन संचालक डॉ. सलोनी सेडाना ने हाल ही में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए स्पष्ट निर्देश दिए थे कि 15 फरवरी के बाद किसी भी प्रकार के नए ‘क्रय आदेश’ (Purchase Order) जारी नहीं किए जाएंगे। उन्होंने निर्देश दिए थे कि केवल पुराने कार्यों के भुगतान की प्रक्रिया की जाए और सभी बिल-वाउचर 15 मार्च तक जमा कर दिए जाएं ताकि वित्तीय सत्र में भुगतान हो सके। परंतु, रीवा में इन आदेशों की धज्जियां उड़ाते हुए प्रभारी CMHO डॉ. अनुराग शर्मा ने कुर्सी संभालते ही 1.38 करोड़ रुपये की दवा और उपकरण खरीदी की नोटशीट आगे बढ़ा दी है। विभागीय सूत्र इसे बजट को “ठिकाने लगाने” की एक सुनियोजित साजिश बता रहे हैं।

कलेक्टर की नियुक्ति पर सवाल: अधिकार क्षेत्र से बाहर का फैसला?
डॉ. अनुराग शर्मा को CMHO का प्रभार सौंपने का जिला कलेक्टर का निर्णय भी विवादों में है। सूत्रों के अनुसार, डॉ. शर्मा को यह प्रभार जनवरी 2026 के वेतन भुगतान और लंबित वित्तीय प्रकरणों के निराकरण के नाम पर दिया गया है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2023 से शासन ने कलेक्टरों से क्षेत्रीय संचालक और CMHO जैसे पदों के प्रभार देने का अधिकार वापस ले लिया था। वर्तमान नियमों के अनुसार, यह निर्णय केवल संचालनालय स्वास्थ्य सेवाएं या प्रशासकीय विभाग ही ले सकता है। बावजूद इसके, कलेक्टर रीवा ने डॉ. शर्मा को प्रभार सौंपा, जिसे अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर लिया गया निर्णय माना जा रहा है।

पुराना गिरोह फिर सक्रिय: स्टोर पर कब्जा और पर्दे के पीछे का खेल
डॉ. अनुराग शर्मा के कार्यभार ग्रहण करते ही जिले का वह ‘पुराना गिरोह’ सक्रिय हो गया है, जिसे स्वास्थ्य विभाग के बजट को भुनाने में महारत हासिल है। इस गिरोह का मास्टरमाइंड सीएमएचओ कार्यालय के अधीन केन्द्रीय भंडार (स्टोर) में डेरा जमाए हुए है।

काम करने का तरीका: गिरोह के सदस्य स्टोर के सभी निर्णयों में अप्रत्यक्ष भूमिका निभाते हैं, लेकिन कागजों पर हस्ताक्षर उन कर्मचारियों के कराते हैं जिनकी वहां आधिकारिक पदस्थापना है।
सुरक्षा कवच: यदि कोई अनियमितता पकड़ी जाती है, तो फंसते वह कर्मचारी हैं जिनके हस्ताक्षर हैं, जबकि असली मलाई यह गिरोह काटता है।
कलेक्ट्रेट की दौड़: प्रभारी CMHO द्वारा तैयार की गई 1.38 करोड़ की नोटशीट पर कलेक्टर का अनुमोदन दिलाने के लिए यही गिरोह कलेक्ट्रेट के चक्कर लगा रहा है।

नियमों की अनदेखी: वरिष्ठता को किया गया दरकिनार
लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के 24 फरवरी 2021 के आदेश के अनुसार, CMHO का प्रभार जिले के वरिष्ठतम विशेषज्ञ या जिला स्वास्थ्य अधिकारी (DHO) को दिया जाना चाहिए।

रीवा में वर्तमान में डॉ. आर.बी. चौधरी जिला स्वास्थ्य अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं, जो डॉ. अनुराग शर्मा से वरिष्ठ हैं और अप्रैल 2026 में सेवानिवृत्त होने वाले हैं। नियमानुसार डॉ. चौधरी इस पद के हकदार थे, लेकिन उनकी वरिष्ठता को नजरअंदाज कर डॉ. शर्मा को प्रभार दिया गया।

मूल पदस्थापना गांव में, रसूख जिला मुख्यालय में
डॉ. अनुराग शर्मा की मूल पदस्थापना हनुमना क्षेत्र के पहाड़ी स्वास्थ्य केंद्र में मेडिकल ऑफिसर के तौर पर है। लेकिन राजनीतिक संरक्षण और प्रशासनिक पहुंच के चलते वे वर्षों से जिला मुख्यालय में ‘जिला क्षय अधिकारी’ के रूप में जमे हुए हैं। एक तरफ जिले के कई डॉक्टर ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा देने को मजबूर हैं, वहीं रसूखदार अधिकारी नियमों को ठेंगा दिखाकर शहर की मलाईदार कुर्सियों पर काबिज हैं।

EOW की जांच के घेरे में भी हैं डॉ. शर्मा
डॉ. अनुराग शर्मा का विवादों से पुराना नाता रहा है। तत्कालीन CMHO डॉ. संजीव शुक्ला के कार्यकाल में ग्रुप-डी के पदों पर हुई आउटसोर्स भर्ती में व्यापक अनियमितताओं की शिकायत हुई थी, जिसकी जांच वर्तमान में EOW (आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ) रीवा कर रहा है। डॉ. अनुराग शर्मा उस भर्ती समिति के अध्यक्ष थे। यदि EOW की जांच में भर्ती नियमविरुद्ध पाई जाती है, तो डॉ. शर्मा की मुश्किलें बढ़ना तय है।

रीवा स्वास्थ्य विभाग में जिस तरह से मिशन संचालक के आदेशों को दरकिनार कर वित्तीय वर्ष के अंत में करोड़ों की खरीदी की योजना बनाई गई है, वह प्रशासनिक शुचिता पर बड़े सवाल खड़े करती है। कर्मचारियों के वेतन के नाम पर शुरू हुआ यह प्रभार का खेल अब ‘कमीशन के खेल’ में बदलता दिख रहा है। अब देखना यह होगा कि शासन इस अवैध प्रभार और नियमविरुद्ध खरीदी पर क्या कार्रवाई करता है।

मुख्य बिंदु एक नजर में:
1.38 करोड़ की खरीदी: मिशन संचालक के आदेश के विपरीत नई खरीदी की नोटशीट बढ़ाई गई।
अवैध प्रभार: कलेक्टर द्वारा नियमों के विरुद्ध CMHO का प्रभार सौंपने का आरोप।
वरिष्ठता का अपमान: वरिष्ठ डॉ. आर.बी. चौधरी को छोड़कर कनिष्ठ डॉ. शर्मा को दी गई कुर्सी।
भ्रष्टाचार की जांच: ग्रुप-डी भर्ती मामले में डॉ. शर्मा के विरुद्ध EOW की जांच जारी।

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