अक्सर करीबी ही करते हैं बच्चों का यौन शोषण, जानिए थोड़ी सावधानी से कैसे कर सकते हैं बचाव

आए दिन सामने आ रहे यौन शोषण के मामले, सतर्क रहना है जरूरी
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child sexual abuse

बच्चा पैदा होने के बाद माता-पिता उन्हें हर तरह का ज्ञान देने की कोशिश करते हैं। उठने-बैठने, चलने-फिरने और बोलने का तरीका तक सिखाते हैं। पेरेंट्स उनकी सुरक्षा को लेकर भी कई तरह की सीख देते हैं। उन्हें नाम, पता, फोन नंबर रटवाते हैं। सड़क पर करना सहित अन्य छोटी-छोटी बाते सिखाते हैं। वहीं जब बॉडी सेफ्टी की बात आती है तो लोगों का इस तरफ ध्यान तब जाता है जब बहुत देर हो चुकी होती है। सेंटर्स फॉर डिसीज कंट्रोल की एक रिपोर्ट के अनुसार हर 6 में से 1 लड़का और 4 में से 1 लड़की 18 साल से पहले सेक्शुअल अब्यूज (यौन शोषण) का शिकार हो जाता है। देखा जाए तो यह मामले कम नहीं हैं। यह किसी भी बच्चे के साथ हो सकता, देखने में यही आता है कि ज्यादातर मामलों में करीबी ही इस तरह के काम में शामिल होते हैं। बच्चे यदि बचपन में सेक्शुअल अब्यूज का शिकार हो जाते हैं, तो उम्रभर इसका असर रहता है। इसलिए उन्हें इस परिस्थिति से लडऩे के लिए तैयार करना बहुत जरूरी है। आइये जानते हैं क्या कर सकते हैं इसके लिए ...

डर के कारण चुप रहते हैं बच्चे
यौन शोषण के शिकार हुए बच्चे ज्यादातर केसेज में डर की वजह से चुप-चाप रहने लगते हैं। कई बार मां-बाप से कम्युनिकेशन गैप होने के कारण वह अपने में ही घुटते रहते हैं, जिसका असर उनकी पूरी पर्सनैलिटी पर पड़ता है। क्लीनिकल ट्रॉमा स्पेशलिस्ट और सेक्शुअल वॉइलेंस प्रिवेंशन ऐंड रिस्पॉन्स एजुकेटर लेक्सी कोस्टर ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर पोस्ट हुए बच्चों को शिक्षित करने के तरीके सुझाए हैं।

बच्चों को सिखाएं क्या नहीं रखना है सीक्रेट
सबसे पहले तो बच्चों को ये बताएं कि यदि कोई उन्हें ऐसी बात सीक्रेट रखने को कहे जिनसे बच्चे परेशान, दुखी और सुरक्षित न फील करें तो वे सही नहीं होता है। बच्चों को सीक्रेट और सरप्राइज रखने के बीच अंतर सिखाएं। ज्यादातर शोषण के मामले में बच्चों को अपनी करतूत को सीक्रेट रखने के लिए कहते हैं। अक्सर बच्चे सही और गलत में पहचान नहीं कर पाते।

समझाएं क्या होती हैं बुरी फीलिंग्स
बच्चों को सुरक्षित व असुरक्षित महसूस करने के बीच फर्क बताएं। उन्हें इस बात की ट्रेनिंग दें कि किसी की ऐसी कोई भी हरकत जिससे उनका दिल तेज धड़कने लगे, वे कांपने लगें, उन्हें अच्छा महसूस न हो, पेट में गुदगुदी हो वगैरह की जानकारी पेरेंट्स को जरूर दें। उन्हें इस बात का अहसास कराएं कि उनकी हर दिक्कत को आप हमेशा सुनने को तैयार हैं। उन्हें सुरक्षित महसूस करवाएं ताकि वे आपसे हर बात शेयर कर सकें।

बॉडी सेफ्टी चेक करते रहें 
जब भी आपका बच्चा किसी टीचर, परिवार के सदस्य या पड़ोसी के साथ अकेले खेल रहा हो तो अचानक से बिना बताए पहुंच जाएं। कई बार ऐसे मामले आते हैं कि बच्चों के साथ अकेले रहने वाले अडल्ट्स ही उन्हें नुकसान पहुंचाते हैं। आप अचानक से पहुंचकर इन अडल्ट्स के रिऐक्शन भांपने की भी कोशिश करें। बच्चों से समय-समय पर पूछें भी कि कोई गलत हरकत तो उनके साथ नहीं हुई। 

बच्चे को न छोड़ें अकेला
परिवार में कोई गेदरिंग हो या बच्चे कहीं खेलने जाएं तो उन पर विशेष नजर रखें। कोशिश तो ये करें कि उन्हें अकेला न छोड़े, बच्चों को सामने और आसपास ही खेलने को कहें। बच्चों को इस बात से भी सचेत कर दें कि दूसरे से उन्हें कितनी दूरी रखनी है। यह भी जानकारी दें कि किसी और को छूकर बात नहीं करनी है। 

किस या टच करने के लिए करें मना
यदि कोई बाहरी व्यक्ति बच्चे को किस करता है या टच करता है तो उसे मना कर दें। स्कूल मेंं बच्चे की सुरक्षा के क्या इंतजाम है, इसकी जानकारी अवश्य ले लें। इसके अलावा बच्चे से ये सवाल कर सकते हैं....

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