देश में जब-जब भारत को हिंदू राष्ट्र बनाए जाने की बहस तेज होती है, तब-तब धार्मिक स्वतंत्रता और प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर सवाल भी खड़े होने लगते हैं। हाल के दिनों में प्रयागराज के माघ मेले से जुड़ा एक मामला इसी बहस के केंद्र में आ गया है। Swami Avimukteshwaranand को लेकर माघ मेला प्राधिकरण द्वारा भेजे गए नोटिस के बाद यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या धार्मिक व्यक्तित्वों और आयोजनों पर प्रशासनिक सख्ती बढ़ाई जा रही है।
भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की बातें अक्सर राजनीतिक मंचों और जनसभाओं में सुनाई देती हैं। लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे उलट नजर आती है। सवाल यह है कि अगर देश में बहुसंख्यक हिंदू हैं, तो फिर हिंदुओं को ही अपने पर्व, पूजा और धार्मिक आयोजनों में सबसे ज़्यादा रोक-टोक का सामना क्यों करना पड़ता है? प्रयागराज के माघ मेले में Swami Avimukteshwaranand को भेजे गए नोटिस ने इसी सवाल को एक बार फिर केंद्र में ला खड़ा किया है।
हिंदू राष्ट्र की चर्चा और धार्मिक आयोजनों पर पहरा; स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पर प्रतिबंध की अटकलें, माघ मेला प्राधिकरण के नोटिस से उठा विवाद
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क्या है पूरा मामला
प्रयागराज माघ मेले के दौरान Prayagraj Magh Mela Authority ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को एक नोटिस भेजा था। नोटिस में उनसे यह स्पष्ट करने को कहा गया कि वे किस आधार पर स्वयं को ज्योतिष्पीठ शंकराचार्य के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं, जबकि यह मामला न्यायालय में विचाराधीन बताया जा रहा है।
इस नोटिस के बाद यह अटकलें तेज हो गईं कि क्या स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पर मेला क्षेत्र में प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं या उनके आश्रम व जमीन को लेकर भी कोई कार्रवाई हो सकती है।
प्रशासन इसे एक “कानूनी प्रक्रिया” बता रहा है, लेकिन संत समाज और श्रद्धालुओं में इसे धार्मिक हस्तक्षेप के तौर पर देखा जा रहा है।

- क्या साधु-संत अब प्रशासन की अनुमति से बोलेंगे?
यह पहली बार नहीं है जब किसी बड़े धार्मिक आयोजन में साधु-संतों को नोटिस भेजे गए हों। सवाल यह है कि
क्या आस्था अब सरकारी फाइलों में दर्ज शर्तों पर चलेगी?
क्या संत अपने धार्मिक पद और परंपरा की घोषणा से पहले प्रशासन से अनुमति लेंगे?
हिंदू समाज का एक बड़ा वर्ग पूछ रहा है कि जब अन्य समुदायों के धार्मिक आयोजनों में इतनी सख्ती नहीं दिखती, तो हिंदू आयोजनों में ही प्रशासन इतना सक्रिय क्यों हो जाता है?
प्रतिबंध और जमीन कार्रवाई की अटकलें
नोटिस के बाद यह चर्चाएं भी तेज हैं कि मेला प्रशासन स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शिविर, कार्यक्रमों या उनसे जुड़ी जमीन पर कार्रवाई कर सकता है। हालांकि, अभी तक इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
लेकिन सवाल उठता है—क्या नोटिस सिर्फ चेतावनी है या आगे किसी बड़ी कार्रवाई का संकेत?
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समर्थकों का आरोप: आस्था को दबाया जा रहा
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थकों का कहना है कि यह सिर्फ एक संत का मामला नहीं है, बल्कि पूरे हिंदू समाज की धार्मिक स्वतंत्रता का प्रश्न है।
उनका आरोप है कि:
कुंभ और माघ जैसे आयोजनों में संतों को ही कटघरे में खड़ा किया जाता है
धार्मिक परंपराओं को कानून के तराजू पर तौला जाता है
जबकि संविधान धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है

धार्मिक आयोजनों पर बढ़ता प्रशासनिक नियंत्रण?
आलोचकों का कहना है कि एक ओर देश में हिंदू राष्ट्र की बातें होती हैं, वहीं दूसरी ओर हिंदुओं को अपने ही त्योहारों, पूजा-पाठ और धार्मिक आयोजनों पर रोक-टोक का सामना करना पड़ता है। माघ मेला जैसे प्राचीन धार्मिक आयोजन में साधु-संतों को नोटिस भेजे जाना इसी चिंता को और गहरा करता है।
कई लोगों का मानना है कि प्रशासन को कानून-व्यवस्था बनाए रखने का अधिकार है, लेकिन धार्मिक भावनाओं और परंपराओं का भी सम्मान होना चाहिए।
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प्रशासन का तर्क: कानून सर्वोपरि
वहीं प्रशासन का कहना है कि मेला क्षेत्र में कानून-व्यवस्था बनाए रखना उसकी जिम्मेदारी है। जब कोई विषय अदालत में लंबित हो, तो उससे जुड़े दावे सार्वजनिक मंच से करने पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
लेकिन आलोचक पूछते हैं—क्या कानून केवल संतों और हिंदू आयोजनों के लिए ही सख्त है?
हिंदू राष्ट्र की बहस बनाम ज़मीनी हकीकत
यह पूरा विवाद हिंदू राष्ट्र की बहस को और तीखा कर रहा है। एक ओर हिंदू पहचान की राजनीति होती है, दूसरी ओर जब वही हिंदू समाज अपने पर्व, पूजा और संतों के साथ खड़ा होता है, तो उसे नियमों, नोटिसों और प्रतिबंधों का सामना करना पड़ता है।
यही विरोधाभास अब लोगों को चुभने लगा है।
बड़ा सवाल
* क्या हिंदू होना अब प्रशासनिक जांच का विषय बन गया है?
* क्या धार्मिक आस्था पर भी अब सरकारी नियंत्रण स्वीकार करना होगा?
* और अगर यही स्थिति रही, तो हिंदू राष्ट्र की बात केवल नारा बनकर रह जाएगी?कैबिनेट के बड़े फैसले: अटल पेंशन योजना 2030-31 तक बढ़ी; MSME सेक्टर में जान फूंकने के लिए SIDBI को 5,000 करोड़ रुपये की मंजूरी
समर्थकों की प्रतिक्रिया
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थकों ने नोटिस को अनुचित बताते हुए कहा है कि यह धार्मिक स्वतंत्रता पर सीधा हस्तक्षेप है। उनका कहना है कि शंकराचार्य की परंपरा सदियों पुरानी है और इसे प्रशासनिक आदेशों से नहीं तय किया जा सकता।
समर्थकों ने यह भी आशंका जताई कि अगर ऐसे नोटिसों का सिलसिला जारी रहा, तो आगे चलकर अन्य संतों और धार्मिक संस्थानों पर भी इसी तरह की कार्रवाई हो सकती है।

जमीन और प्रतिबंध की अटकलें
नोटिस के बाद यह चर्चा भी शुरू हो गई कि क्या स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से जुड़ी जमीन या मेला क्षेत्र में उनके कार्यक्रमों पर रोक लगाई जा सकती है। हालांकि, इस संबंध में अभी तक कोई आधिकारिक आदेश या पुष्टि सामने नहीं आई है। प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि फिलहाल केवल स्पष्टीकरण मांगा गया है, किसी तरह की दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई है।
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व्यापक बहस का हिस्सा
यह मामला केवल एक संत या एक नोटिस तक सीमित नहीं है। यह उस बड़ी बहस का हिस्सा बन चुका है, जिसमें धार्मिक स्वतंत्रता, राज्य की भूमिका और कानून के दायरे को लेकर सवाल उठते हैं।
क्या धार्मिक आयोजनों में प्रशासन की भूमिका केवल व्यवस्था तक सीमित रहनी चाहिए, या उसे धार्मिक दावों पर भी हस्तक्षेप का अधिकार है—यह सवाल अब खुलकर सामने आ गया है।
प्रयागराज माघ मेले से जुड़ा स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का मामला देश में चल रही हिंदू राष्ट्र की बहस और धार्मिक स्वतंत्रता के सवालों को फिर से चर्चा में ले आया है। जहां एक ओर प्रशासन कानून और व्यवस्था का हवाला दे रहा है, वहीं दूसरी ओर संतों और श्रद्धालुओं में असंतोष बढ़ रहा है। आने वाले समय में इस मामले पर प्रशासन, अदालत और समाज का रुख क्या रहेगा, यही तय करेगा कि धार्मिक आयोजनों और आस्था की अभिव्यक्ति की सीमा कहां तक मानी जाएगी।
