10 सितंबर से शुरू होगा पितृपक्ष, पितरों की मुक्ति के लिए लोग करेंगे श्राद्ध

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पूर्वजों को श्रद्धा पूर्वक यादकर श्राद्ध कर्म किया जाता है। श्राद्ध उसी तिथि को किया जाता है जिस तिथि को पितर परलोक गए थे। श्राद्ध न केवल पितरों की मुक्ति के लिए किया जाता है, बल्कि उनके प्रति अपना सम्मान प्रकट करने के लिए किया जाता है। पितृपक्ष का प्रारंभ शनिवार के दिन पूर्णिमा तिथि 10 सितंबर से होगा और अमावस्या तिथि पर 25 सितंबर को समापन होगा।भागवत प्रवक्ता आशीषाचार्य महाराज वृंदावनोपासक के अनुसार पितृपक्ष 15 दिनों के बजाय इस बार 16 दिन का रहेगा। अष्टमी तिथि 17 सितंबर के स्थान पर 18 सितंबर को मनाई जाएगी। बताया कि पितृपक्ष में श्रद्धा पूर्वक अपने पूर्वजों को जल देने का विधान है। प्रातरू काल जल में थोड़ा काला ति, मोटा कुशा के साथ पितृ तीर्थ से जल अर्पित करने का विधान है। शास्त्रों के अनुसार पितृपक्ष में पंचवली के माध्यम से 5 विशेष प्रकार के जीवो को श्राद्ध का बना भोजन कराने का नियम है। इसके लिए सबसे पहले ब्राह्मणों के लिए पकाए गए भोजन को 5 पत्तल मे निकालें और सभी पत्तल में भोजन रखकर सभी के अलग-अलग मंत्र बोलते हुए एक-एक पर अक्षत छोड़कर पंचवली समर्पित की जाती ह। सबसे पहला ग्रास गाय के लिए, दूसरा कौवा के लिए, तीसरा कुत्ता के लिए, चैथा ग्रास देव बली होता है जिसे जल में प्रवाहित कर दें या फिर गाय को दे दे और अंतिम पांचवा ग्रास चीटियों के लिए सुनसान जगह पर रख देना चाहिए।
श्रद्धकर्म में यह वर्जित
ेंपितरों की प्रसन्नता के लिए 15 दिन का पितृ पक्ष में जो भी श्राद्ध कर्म करते हैं उन्हें इस दौरान बाल, दाढ़ी नहीं कटवाना चाहिए ना ही तेल साबुन लगाना चाहिए। बाल और दाढ़ी कटवाने से धन, वंश की हानि होती है। श्राद्ध पक्ष में घर में सात्विक भोजन बनाना चाहिए इन दिनों में तामसी भोजन से परहेज करना चाहिए। श्राद्ध पक्ष में लहसुन प्याज से बना भोजन नहीं करना चाहिए ना ही कराना चाहिए और शराब व मांस खाने वालों से दूर रहें।